Sunday, October 27, 2013

sin

पाप पुण्य  का हिसाब परमात्मा नहीं रखता उसके पास इतनी फुरसत  ही नहीं कि वो  एक एक मनुष्य का लेखा  जोखा रखे  । उसके लिए पापी और पुण्यात्मा एक बराबर हैं दोनों के लिए एक सा ही प्यार बरस रहा है यदि वही भेद करने लगा तो काहे का परमात्मा हुआ । अपने पाप और पुण्य  का हिसाब   हम ही स्वयं रखतें है । जब हम कोई ऐसा कार्य करतें हैं जिससे हमें ग्लानि होती है तब  हमारा चेतना  का स्तर नीचे गिर जाता है यही पाप है तो चेतना का स्तर गिरा कि पाप हुआ  और जब हम कोई ऐसा कार्य करतें है जिससे कि चेतना स्तर ऊपर उठ जाता हैं तो यही पुण्य है । भगवान  बुद्ध ने कहा है कि होश में रहकर जो भी कार्य किया जाता है वो पुण्य  है और जो बेहोशी में किया जाए वो पाप है।मूर्छा में किया गया दान भी पाप है  । हर समाज में व  हर काल में  पाप और पुण्य  की,अलग अलग मान्यताएं होती है आज जो मान्य है हो सकता वो पुराने समय में मान्य  न हो या किसी और समाज में मान्य  न हो तब हम उस कार्य को करें तो हमें ग्लानि होगी। जब हम नैसर्गिक  नियमों  से जुड़े होते हैं यानी प्रकृति के नियमों  को मानते है तब हर काल व हर समाज के लिए वहां एक सी ही मान्यताएं होती हैं तब  न पाप होता  न पुण्य जो उचित है वही होता है । चोरी करना पाप हैं पर  यदि कोई भूखा रोटी चुरा रहा है तो पापी वो नहीं है हम सब उसके जिम्मेदार हैं उसके हिस्से का खाना उसको नहीं मिला किसी के पास ज्यादा चला गया प्रकृति सब का पेट भरने के लिए सक्षम हैं ।
                                        - सीमा आनंदिता

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